Chapter 1
वह राजकुमार जिसने कभी सिर नहीं झुकाया
यह अध्याय महाराणा प्रताप के जन्म, बचपन और उनके साहसी स्वभाव का परिचय देता है। बचपन से ही उन्हें घुड़सवारी और युद्धकला में रुचि थी। कठोर प्रशिक्षण और अपनी प्रजा के प्रति समर्पण ने उन्हें एक महान योद्धा बनाया। अध्याय के अंत में वे मेवाड़ और अपनी मातृभूमि की रक्षा का संकल्प लेते हैं।
अरावली की पर्वत श्रृंखलाएँ सदियों से मेवाड़ की रक्षा करती आ रही थीं। इन पहाड़ियों ने अनगिनत राजाओं, वीर योद्धाओं और साधारण लोगों का इतिहास अपनी आँखों से देखा था। यह केवल पत्थरों का समूह नहीं था, बल्कि उस भूमि का प्रतीक था जहाँ स्वतंत्रता और स्वाभिमान सबसे बड़ा धन माने जाते थे।
सोलहवीं शताब्दी का भारत परिवर्तन के दौर से गुजर रहा था। अनेक छोटे-बड़े राज्य अपने अस्तित्व और सम्मान की रक्षा के लिए संघर्ष कर रहे थे। इन्हीं राज्यों में मेवाड़ एक ऐसा राजपूत राज्य था, जिसकी वीरता और स्वतंत्रता पूरे देश में प्रसिद्ध थी।
9 मई 1540 को कुंभलगढ़ दुर्ग में महाराणा उदय सिंह द्वितीय और महारानी जयवंता बाई के यहाँ एक पुत्र का जन्म हुआ। उसका नाम रखा गया – प्रताप।
उस समय किसी को यह अनुमान नहीं था कि यही बालक एक दिन भारत के इतिहास के सबसे महान योद्धाओं में गिना जाएगा।
बालक प्रताप
प्रताप को बचपन से ही राजसी वैभव और सुख-सुविधाओं में विशेष रुचि नहीं थी।
जब दूसरे राजकुमार महलों में खेलते थे, तब प्रताप घोड़ों के साथ समय बिताना अधिक पसंद करते थे। उन्हें तलवार चलाना, धनुष-बाण का अभ्यास करना और पहाड़ी रास्तों पर घुड़सवारी करना अत्यंत प्रिय था।
एक दिन उनके गुरु ने उनसे पूछा,
"राजकुमार, तुम इतनी कठिन साधना क्यों करते हो?"
प्रताप ने बिना एक क्षण सोचे उत्तर दिया,
"ताकि जब मेरी प्रजा को मेरी आवश्यकता हो, तब मैं उनके सामने कभी कमजोर न पड़ूँ।"
गुरु मुस्कुराए।
उन्हें समझ आ गया था कि यह बालक केवल एक राजकुमार नहीं, बल्कि भविष्य का एक उत्तरदायी शासक बनने की तैयारी कर रहा है।
कठोर प्रशिक्षण
मेवाड़ के राजकुमारों का प्रशिक्षण अत्यंत कठिन होता था।
सूर्योदय से पहले ही घुड़सवारी का अभ्यास आरंभ हो जाता था।
कभी भारी ढाल लेकर ऊँची पहाड़ियों पर चढ़ना पड़ता, तो कभी तेज गति से दौड़ते घोड़े पर बैठकर लक्ष्य भेदना पड़ता।
घंटों तक तलवार चलाने के अभ्यास से हाथों में छाले पड़ जाते, लेकिन प्रताप ने कभी शिकायत नहीं की।
उनका विश्वास था कि जो राजा स्वयं कठिनाइयों का सामना नहीं कर सकता, वह अपनी प्रजा की रक्षा भी नहीं कर सकता।
एक अनोखी मित्रता
राजमहल के अस्तबल में एक युवा मारवाड़ी घोड़ा था।
उसकी सबसे बड़ी पहचान उसके भीतर की ओर मुड़े हुए कान थे। वह अत्यंत शक्तिशाली था, लेकिन किसी को अपने निकट आसानी से आने नहीं देता था।
अनेक सैनिक उसे साधने का प्रयास कर चुके थे, परंतु हर बार असफल रहे।
एक दिन प्रताप शांत भाव से उसके पास पहुँचे।
उन्होंने न तो बल का प्रयोग किया और न ही उसे डराने का प्रयास किया।
उन्होंने केवल उसके सामने पानी रखा और धीरे से उसकी गर्दन पर हाथ फेर दिया।
इस बार घोड़ा शांत खड़ा रहा।
अस्तबल के वृद्ध सेवक ने यह दृश्य देखा और आश्चर्य से कहा,
"बल से केवल युद्ध जीता जा सकता है, लेकिन निष्ठा और विश्वास सम्मान से ही प्राप्त होते हैं।"
आने वाले वर्षों में यही घोड़ा चेतक के नाम से अमर हो जाएगा।
बदलता हुआ समय
समय के साथ प्रताप युवा होते गए और भारत का राजनीतिक वातावरण भी बदलने लगा।
मुगल सम्राट अकबर अपने साम्राज्य का तेज़ी से विस्तार कर रहा था। अनेक राज्यों ने उससे संधि कर ली। कुछ ने अपनी इच्छा से और कुछ ने परिस्थितियों के कारण।
लेकिन मेवाड़ का निर्णय अलग था।
यहाँ के शासकों का विश्वास था कि स्वतंत्रता किसी भी मूल्य पर आसानी से नहीं छोड़ी जानी चाहिए।
यही निर्णय आगे चलकर इतिहास की दिशा बदलने वाला सिद्ध हुआ।
एक संकल्प
एक संध्या प्रताप कुंभलगढ़ दुर्ग की प्राचीर पर खड़े होकर दूर तक फैले अपने राज्य को देख रहे थे।
नीचे गाँवों में लोग दिनभर का कार्य समाप्त कर अपने घर लौट रहे थे। खेतों से किसान वापस आ रहे थे। बच्चे खेल रहे थे और घरों के चूल्हों से धुआँ उठ रहा था।
प्रताप ने अनुभव किया कि किसी भी राज्य की वास्तविक शक्ति उसके महलों या खजानों में नहीं होती।
उसकी सबसे बड़ी शक्ति उसकी प्रजा होती है।
उन्होंने मन ही मन एक संकल्प लिया,
"जब तक मेरे प्राण रहेंगे, मैं मेवाड़ और अपनी प्रजा की रक्षा करता रहूँगा।"
इतिहास ने शायद उस क्षण उनके इन शब्दों को दर्ज नहीं किया।
किन्तु उनके जीवन के प्रत्येक निर्णय ने यह सिद्ध कर दिया कि उन्होंने अपने इस संकल्प को अंत तक निभाया।